15 November 2009

इसी खोखलेपन के साथ हम आसानी से सांस्कृतिक गुलामी के लिए तैयार हो जाते हैं।

आज साम्राज्यवादी देशों को सीधे किसी देश में सेना भेज कर उसे अपना उपनिवेश बनाने की ज़रूरत नहीं है। यह भी किया जा सकता है किंतु बहुत ही ज़रूरी हो तब। उससे आसान तरीका है कि उस देश को सांस्कृतिक गुलामी का एहसास कराया जाए। उसे यह बता दिया जाए कि उसकी संस्कृति से हमारी संस्कृति श्रेष्ठ है। मिथकों का गढा जाना भी साम्राज्यवादी तरीका है जैसे ब्रिटिश उपनिवेश ने मिथक गढा था कि उसके राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता है, वह अजेय है। उसकी संस्कृति, उसकी भाषा ही श्रेष्ठ है, हमारी देशज भाषा, हमारी देशज संस्कृति,सब गंवार और पिछडेपन की शिकार है।


हम काश्मीर से कन्याकुमारी तक एक ही स्वाद ,एक ही तरह के जूते, एक ही तरह के कपडों के अभ्यस्त हो जाते हैं। यह एकरूपता हमें गुलाम भी बना रही है, हमें यह ख़याल भी नहीं आता।

साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति के लिए ही हिन्दी और उर्दू का विवाद पैदा किया गया,जबकि लिपि की भिन्नता के बावजूद दोनों एक थीं। इसी के आधार पर द्वि-राष्ट्र का फार्मूला तय किया गया। सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की मार ऐसी ही है । मीडिया भी इसी काम में लगा है। वो हमें निरर्थक कार्यक्रमों में इतना उलझा देता है की हमें अपने खोखलेपन का एहसास भी नहीं होता। इसी खोखलेपन के साथ हम आसानी से सांस्कृतिक गुलामी के लिए तैयार हो जाते हैं।