30 October 2009

यह जो चाबुक है यह नियंत्रक है ,ख़ुद का भी तथा औरों का भी।

हम भी हैं ब्लॉग के मैदान में; लेकर अपनी चाबुक ! 


 यह जो चाबुक है यह नियंत्रक है ,ख़ुद का भी तथा औरों का भी। 
हमारे समय की विडम्बना भी यही है कि एक अदृश्य चाबुक हवा में लहराता है और हमारे सपनों से लेकर हमारे यथार्थ के घोडों तक की नंगी पीठ पर सटाक से पड़ता है और उधडी हुई पीठ से ढेर सा खून बह निकलता है। चाबुक के बहाने ही हम हम ब्लॉग की दुनिया में आत्मनियंत्रण ले कर आए हैं।